India significantly increases crude oil imports from Russia over the past week due to Middle East supply disruptions and Hormuz tensions. Imports rise by up to 50% as global oil dynamics shift.
नई दिल्ली। पिछले एक हफ्ते में वैश्विक तेल बाजार में आए तेज उतार-चढ़ाव और मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। खासतौर पर रूस से कच्चे तेल के आयात में अचानक आई तेजी ने यह संकेत दिया है कि भारत अब तेजी से वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भरता बढ़ा रहा है।
दरअसल, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ के आसपास ईरान के बढ़ते हमलों के कारण मिडिल ईस्ट से तेल सप्लाई प्रभावित हुई है। इस स्थिति में भारत ने रूस की ओर रुख करते हुए अपने आयात में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है। जानकारी के अनुसार, भारत ने पिछले एक सप्ताह में रूस से तेल आयात में लगभग 45 से 50 प्रतिशत तक वृद्धि की है, जिससे दैनिक आयात बढ़कर करीब 1.5 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुंच गया है।
इस दौरान भारत ने करीब 30 मिलियन बैरल रूसी कच्चा तेल खरीदा, जो सामान्य स्तर से काफी अधिक है। खास बात यह रही कि कुछ टैंकर, जो पहले चीन की ओर जा रहे थे, उन्हें भी भारत की ओर मोड़ दिया गया। यह दिखाता है कि भारत ने तेजी से परिस्थितियों के अनुरूप अपनी सप्लाई रणनीति को ढाला है।
हालांकि, बढ़ती मांग के साथ कीमतों में भी तेजी देखने को मिली है। रूस का प्रमुख Urals crude जो पहले डिस्काउंट पर मिल रहा था, अब लगभग 98 से 100 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया है। यानी सस्ते तेल का लाभ धीरे-धीरे कम होता नजर आ रहा है।
इसी बीच अमेरिका की ओर से भारत को कुछ राहत भी मिली है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ने रूसी तेल खरीद को लेकर सीमित अवधि की छूट (waiver) दी है, जिससे भारतीय रिफाइनरियों को खरीद बढ़ाने में सुविधा हुई है। इस फैसले के बाद भारत ने तेजी से रूसी तेल की खरीद बढ़ाई और फंसे हुए कार्गो को भी अपने पक्ष में किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि मिडिल ईस्ट संकट के कारण भारत को तुरंत वैकल्पिक सप्लाई की जरूरत थी और रूस इस समय सबसे बड़ा और व्यावहारिक विकल्प बनकर उभरा। हालांकि, इसके साथ ही लॉजिस्टिक्स, भुगतान व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय दबाव जैसी चुनौतियां भी बनी हुई हैं।
