Coal Gasifier Association Secretary General Dr. Ashok Kumar Balyan has urged India to develop large-scale DME production through coal gasification. DME can be blended with or replace LPG using existing infrastructure, helping reduce LPG imports and save valuable foreign exchange.
भारत में एलपीजी (LPG) के आयात पर बढ़ती निर्भरता और इसके लिए खर्च होने वाली भारी विदेशी मुद्रा को देखते हुए डायमिथाइल ईथर (DME) एक प्रभावी स्वदेशी विकल्प बन सकती है। कोल गैसीफायर एसोसिएशन के महासचिव डॉ. अशोक कुमार बालियान ने कहा कि देश को कोल गैसीफिकेशन के माध्यम से बड़े पैमाने पर डीएमई उत्पादन पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि यह एलपीजी का लगभग आदर्श विकल्प है और इससे ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिलेगी।
डॉ. बालियान ने कहा कि डीएमई के रासायनिक और भौतिक गुण एलपीजी से काफी मिलते-जुलते हैं। इसे एलपीजी के साथ ब्लेंड किया जा सकता है और आवश्यकता पड़ने पर पूरी तरह एलपीजी का स्थान भी ले सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डीएमई के उपयोग के लिए किसी नए इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत नहीं होगी। मौजूदा एलपीजी सिलेंडर, स्टोरेज टैंक, ट्रांसपोर्ट नेटवर्क और वितरण प्रणाली का ही इस्तेमाल किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि भारत अपनी कुल एलपीजी आवश्यकता का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिसके लिए हर वर्ष अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर भारत के आयात बिल और सरकारी सब्सिडी बोझ पर पड़ता है। ऐसे में यदि घरेलू कोयले से डीएमई का उत्पादन बढ़ाया जाए तो एलपीजी आयात में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है और विदेशी मुद्रा की बचत की जा सकती है।
डॉ. बालियान के अनुसार, केंद्र सरकार की कोल गैसीफिकेशन प्रोत्साहन योजना (VGF Scheme) के तहत अब तक कई परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनमें मेथनॉल, अमोनियम नाइट्रेट और अन्य रसायनों के उत्पादन पर फोकस किया गया है, लेकिन डीएमई को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि देश में डीएमई उत्पादन के लिए एक समर्पित बड़े वाणिज्यिक प्रोजेक्ट की जरूरत है।
उन्होंने कहा, “भारत के पास विशाल कोयला भंडार हैं। यदि हम कोल गैसीफिकेशन के जरिए डीएमई का उत्पादन करते हैं तो न केवल एलपीजी आयात पर निर्भरता घटेगी, बल्कि ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता भी बढ़ेगी। तकनीक उपलब्ध है और इसके लिए किसी नई वितरण व्यवस्था की आवश्यकता नहीं है।”
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि डीएमई को बढ़ावा देने से देश के कोयला संसाधनों का मूल्य संवर्धन होगा, आयातित ईंधन पर निर्भरता कम होगी और हर साल एलपीजी आयात पर खर्च होने वाली बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा की बचत संभव हो सकेगी। यह पहल सरकार के ऊर्जा सुरक्षा, आत्मनिर्भर भारत और कोल गैसीफिकेशन मिशन के लक्ष्यों को भी नई गति दे सकती है।
