India introduces SHANTI Act to ease nuclear liability laws, encouraging foreign companies to invest in nuclear power plants. Nuclear capacity and production see significant growth.
भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को लेकर एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। अब तक सख्त नियमों के कारण विदेशी कंपनियां भारत में न्यूक्लियर प्लांट लगाने से हिचक रही थीं, लेकिन सरकार द्वारा लागू किए गए नए शांति अधिनियम (SHANTI Act) से इस स्थिति में सुधार की उम्मीद है।
केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने संसद में बताया कि, पिछले 15 वर्षों में भारत की परमाणु बिजली उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने संसद में जानकारी देते हुए बताया कि भारत की परमाणु ऊर्जा नीति में बड़े सुधार हुए हैं। खासतौर पर 2008 के भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के बाद भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग के रास्ते खुले।
इन समझौतों का असर देश की ऊर्जा क्षमता पर साफ दिखाई देता है। वर्तमान में 16 परमाणु रिएक्टर (RAPS-1 को छोड़कर) अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की निगरानी में आयातित ईंधन से संचालित हो रहे हैं, जिनकी कुल क्षमता 6380 मेगावाट है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2007-08 में जहां परमाणु ऊर्जा उत्पादन 16956 मिलियन यूनिट (MU) था, वहीं 2024-25 तक यह बढ़कर 56681 MU हो गया है। इसी अवधि में कुल क्षमता 4020 मेगावाट से बढ़कर 8780 मेगावाट हो गई है।
भारत ने कई देशों के साथ शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा सहयोग के लिए समझौते किए हैं। रूस के सहयोग से कुडनकुलम परियोजना में 1000 मेगावाट क्षमता के चार नए रिएक्टर (KKNPP-3, 4, 5 और 6) का निर्माण जारी है।
हालांकि, न्यूक्लियर डैमेज के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम 2010 (CLND Act) विदेशी निवेश के लिए एक बड़ी बाधा बना हुआ था। इसके सेक्शन 17(b) और सेक्शन 46 जैसे प्रावधान अंतरराष्ट्रीय मानकों से अलग थे, जिसके कारण विदेशी सप्लायर्स भारत में निवेश करने से बचते रहे।
नागरिक दायित्व अधिनियम 2010 (CLND Act) को लेकर विदेशी कंपनियों की सबसे बड़ी चिंता यही रही है कि इसके कुछ प्रावधान वैश्विक न्यूक्लियर दायित्व ढांचे से अलग हैं। इसे समझने के लिए आपको अंतरराष्ट्रीय मानकों और भारतीय कानून के बीच का फर्क देखना होगा।
अंतरराष्ट्रीय मानक क्या कहते हैं?
दुनिया में आमतौर पर International Atomic Energy Agency के तहत बने कन्वेंशन्स (जैसे Vienna Convention) का पालन होता है। इनका मूल सिद्धांत है:
- Operator Liability Principle
यानी अगर कोई न्यूक्लियर दुर्घटना होती है, तो पूरी जिम्मेदारी प्लांट ऑपरेटर (जैसे भारत में NPCIL) की होती है - सप्लायर (जो उपकरण या टेक्नोलॉजी देता है) को आमतौर पर जिम्मेदारी से छूट होती है
- इससे कंपनियां बिना बड़े कानूनी जोखिम के निवेश कर पाती हैं
CLND Act का सेक्शन 17(b) – कहां है अंतर?
यह सबसे विवादित प्रावधान है।
- यह ऑपरेटर को यह अधिकार देता है कि वह दुर्घटना के बाद सप्लायर से हर्जाना वसूल सकता है
- यानी अगर किसी उपकरण में खराबी के कारण हादसा हुआ, तो विदेशी कंपनी पर भी केस हो सकता है
अंतरराष्ट्रीय प्रैक्टिस:
- सप्लायर को आमतौर पर ऐसी जिम्मेदारी नहीं दी जाती
- इसलिए CLND Act सप्लायर पर अतिरिक्त कानूनी जोखिम डालता है
विदेशी कंपनियों की चिंता:
- अनिश्चित और संभावित भारी मुआवज़ा
- बीमा (insurance) लेना मुश्किल और महंगा
सेक्शन 46 – और भी बड़ा जोखिम
यह सेक्शन और भी ज्यादा चिंता पैदा करता है।
- यह कहता है कि CLND Act के अलावा, अन्य भारतीय कानूनों के तहत भी कार्रवाई हो सकती है
- यानी सिविल के साथ-साथ क्रिमिनल केस भी संभव
अंतरराष्ट्रीय मानक:
- ज्यादातर देशों में न्यूक्लियर दायित्व एक स्पेशल लॉ तक सीमित रहता है
- अलग-अलग कानूनों से मुकदमे की अनुमति नहीं होती
समस्या:
- कंपनियों को “open-ended liability” का डर
- कितनी जिम्मेदारी बनेगी, यह स्पष्ट नहीं
इसका असर क्या पड़ा?
इन दोनों प्रावधानों के कारण:
- United States और France की कंपनियां भारत में निवेश को लेकर सतर्क रहीं
- जैतापुर और कोव्वाडा जैसे प्रोजेक्ट्स में देरी हुई
- न्यूक्लियर सेक्टर में विदेशी टेक्नोलॉजी का प्रवाह धीमा रहा
सरकार अब क्या बदल रही है?
नए SHANTI Act के जरिए:
- दायित्व नियमों को अंतरराष्ट्रीय ढांचे के करीब लाने की कोशिश
- सप्लायर के जोखिम को सीमित करना
- निवेश के लिए स्पष्टता और भरोसा बढ़ाना
इसी वजह से फ्रांस के सहयोग से जैतापुर और अमेरिका के सहयोग से कोव्वाडा जैसी परियोजनाएं लंबे समय तक अटकी रहीं।
अब सरकार द्वारा लागू SHANTI Act के तहत इन दायित्व प्रावधानों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाया गया है। इससे विदेशी कंपनियों का भरोसा बढ़ेगा और भारत में न्यूक्लियर ऊर्जा क्षेत्र में निवेश और तकनीकी सहयोग को नई गति मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के लक्ष्य को हासिल करने में मददगार साबित होगा।
