Rising global prices of ammonia, urea, methanol, and MEG could significantly impact India’s agriculture, fertilizer subsidies, petrochemical industry, and manufacturing sector.
खाड़ी देशों में ईरान और अमेरिका-इस्राइल के बीच चले युद्ध और तनाव का असर कच्चे तेल के साथ साथ यूरिया, अमोनिया और अन्य पेट्रोकेमिकल्स पर पड़ रहा है। वैश्विक बाजार में प्रमुख औद्योगिक और कृषि रसायनों की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है, जिसका असर भारत की अर्थव्यवस्था और कई प्रमुख उद्योगों पर पड़ सकता है। अमोनिया की कीमतों में 300% से अधिक वृद्धि, यूरिया की कीमतों का लगभग 350 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 900 डॉलर प्रति टन तक पहुंचना, मेथेनॉल की कीमतों का लगभग दोगुना होना और मोनो एथिलीन ग्लाइकोल (MEG) की कीमतों में करीब 95% की वृद्धि ने उद्योग जगत की चिंता बढ़ा दी है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ताओं में से एक है और अपनी जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है। ऐसे में यूरिया और अमोनिया की बढ़ती कीमतें सरकार के सब्सिडी बोझ को बढ़ा सकती हैं। इसका सीधा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ सकता है, क्योंकि उर्वरक की लागत बढ़ने से किसानों और खाद्य उत्पादन पर भी दबाव बन सकता है।
दूसरी तरफ, मेथेनॉल और MEG की कीमतों में वृद्धि का असर भारत के पेट्रोकेमिकल और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ सकता है। MEG का उपयोग मुख्य रूप से पॉलिएस्टर, टेक्सटाइल और पैकेजिंग उद्योग में किया जाता है, जबकि मेथेनॉल का इस्तेमाल केमिकल, ऊर्जा और औद्योगिक उत्पादों के निर्माण में किया जाता है। इनकी बढ़ती कीमतें उत्पादन लागत को बढ़ाकर उपभोक्ता वस्तुओं को महंगा बना सकती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक स्तर पर कच्चे माल की कीमतों में यह तेजी जारी रहती है तो भारत के लिए महंगाई नियंत्रण एक बड़ी चुनौती बन सकती है। साथ ही सरकार को उर्वरक सब्सिडी और उद्योगों को राहत देने के लिए अतिरिक्त कदम उठाने पड़ सकते हैं।
वैश्विक कमोडिटी बाजार में हो रही यह तेजी केवल अंतरराष्ट्रीय व्यापार का मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका असर भारत की कृषि, उद्योग, उपभोक्ता बाजार और आर्थिक विकास पर भी दिखाई दे सकता है।
