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एक दशक पहले तक भारत का बिजली क्षेत्र गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रहा था। समस्या बिजली की मांग में कमी नहीं थी, बल्कि राज्य बिजली वितरण कंपनियों (DISCOMs) की खराब वित्तीय स्थिति थी। ये कंपनियां बाजार से महंगी बिजली खरीदती थीं, लेकिन राजनीतिक कारणों से उपभोक्ताओं को सब्सिडी रेट पर बिजली बेची जाती थीं। परिणामस्वरूप, बिजली कंपनियों को भुगतान नहीं मिल रहा था, उपकरण निर्माता नए ऑर्डर से वंचित थे और पूरा पावर सेक्टर ठहराव की स्थिति में पहुंच गया था।
वैल्यूरिसर्चऑनलाइन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2015-16 में Aggregate Technical and Commercial (AT&C) Losses 23.7 प्रतिशत तक पहुंच गए थे। इस संकट से बाहर निकलने के लिए केंद्र सरकार ने वर्ष 2015 में उज्ज्वल डिस्कॉम एश्योरेंस योजना (UDAY) शुरू की। इस योजना के तहत राज्यों ने DISCOMs के 75 प्रतिशत कर्ज को कम ब्याज वाले बॉन्ड के माध्यम से अपने ऊपर लिया, जिससे वितरण कंपनियों को राहत मिली और परिचालन सुधारों की शुरुआत हुई।
इसके बाद वर्ष 2021 में Revamped Distribution Sector Scheme (RDSS) लागू की गई। इस योजना में केंद्र सरकार ने वित्तीय सहायता को प्रदर्शन आधारित सुधारों से जोड़ा। इन सुधारों का असर यह हुआ कि AT&C लॉस घटकर शुरुआती 2020 के दशक में 15.8 प्रतिशत पर आ गया। इससे बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति मजबूत हुई और वर्षों से रुके हुए निवेश फिर से शुरू होने लगे।
बिजली की मांग में रिकॉर्ड वृद्धि
कोविड-19 महामारी के बाद भारत में औद्योगिक गतिविधियों में तेजी, एयर कंडीशनर के बढ़ते उपयोग और मजबूत आर्थिक विकास के कारण बिजली की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई। वर्ष 2014 में जहां देश की अधिकतम बिजली मांग 148 गीगावॉट (GW) थी, वहीं 2024 तक यह बढ़कर 250 गीगावॉट हो गई। यानी सिर्फ दस वर्षों में पीक डिमांड में लगभग 68 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
नवीकरणीय ऊर्जा ने बढ़ाई इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग
भारत के ऊर्जा परिवर्तन में नवीकरणीय ऊर्जा की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही। हालांकि इसका सबसे बड़ा प्रभाव केवल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने बिजली अवसंरचना (Infrastructure) में बड़े निवेश को भी बढ़ावा दिया।
राजस्थान जैसे राज्यों में स्थापित बड़े सौर ऊर्जा पार्कों को राष्ट्रीय ग्रिड से जोड़ने के लिए सैकड़ों किलोमीटर लंबी ट्रांसमिशन लाइनें, नए सब-स्टेशन और आधुनिक स्विचगियर की आवश्यकता पड़ी। वर्ष 2014 में भारत की गैर-जीवाश्म (Non-Fossil) बिजली क्षमता 81 गीगावॉट थी, जो सितंबर 2025 तक बढ़कर 250 गीगावॉट हो गई। इस विस्तार को समर्थन देने के लिए सरकार ने वर्ष 2032 तक ट्रांसमिशन नेटवर्क पर ₹9.15 लाख करोड़ के निवेश की योजना बनाई है।
वैश्विक स्तर पर बढ़ी बिजली उपकरणों की मांग
तेजी से बढ़ते ट्रांसमिशन नेटवर्क और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के कारण दुनिया भर में ट्रांसफॉर्मर, स्विचगियर और अन्य विद्युत उपकरणों की मांग में भारी वृद्धि हुई है। भारत भी इस वैश्विक मांग का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा है, जिससे घरेलू बिजली उपकरण उद्योग को नई गति मिलने की उम्मीद है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के बिजली क्षेत्र की यह सफलता केवल बढ़ती मांग का परिणाम नहीं है, बल्कि समय पर किए गए वित्तीय और संरचनात्मक सुधारों का प्रभाव है। UDAY और RDSS जैसी योजनाओं ने वितरण कंपनियों को स्थिरता प्रदान की, जबकि नवीकरणीय ऊर्जा और ट्रांसमिशन नेटवर्क में निवेश ने देश के ऊर्जा क्षेत्र को दीर्घकालिक विकास की दिशा में आगे बढ़ाया।
