Rising Crude Oil Prices Push Up Urea Costs; Coal Gasification Emerges as a Strategic Solution for India
Rising Crude Oil Prices Push Up Urea Costs; Coal Gasification Emerges as a Strategic Solution for India

Surging crude oil and natural gas prices are driving up global urea and petrochemical costs. Coal gasification is emerging as a key strategy for India to reduce import dependence, strengthen fertilizer security, and boost domestic chemical production.

मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में उछाल का असर अब वैश्विक उर्वरक और पेट्रोकेमिकल उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अमोनिया की कीमतों में 300 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि यूरिया, मेथनॉल और मोनो एथिलीन ग्लाइकोल (MEG) जैसी प्रमुख औद्योगिक और कृषि उत्पादों की कीमतों में भी तेज बढ़ोतरी हुई है। ऐसे समय में भारत के लिए कोल गैसीफिकेशन (Coal Gasification) एक रणनीतिक और आर्थिक विकल्प के रूप में उभर रहा है। इसको लेकर केंद्रीय कोयला मंत्रालय देश में कोल गैसिफिकेशन को लेकर एक रोड़शो किया है, ताकि ज्य़ादा से ज्य़ादा निवेशकों को इस सेक्टर में लाया जा सके।

दरअसल यूरिया उत्पादन में अमोनिया सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल है। अमोनिया मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस से तैयार किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय गैस और ऊर्जा कीमतों में उछाल के कारण अमोनिया की लागत बढ़ने से यूरिया उत्पादन महंगा हो गया है। इससे भारत जैसे देशों पर सब्सिडी का बोझ बढ़ने की आशंका है, क्योंकि देश अपनी कृषि जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में उर्वरकों का उपयोग करता है।

कोयला मंत्रालय के सचिव विक्रम देव दत्त ने बताया कि ऊर्जा बाजार में अस्थिरता को देखते हुए भारत के लिए यूरिया उत्पादन की लागत को नियंत्रित रखना एक बड़ी चुनौती है, इसलिए सरकार घरेलू संसाधनों पर आधारित वैकल्पिक तकनीकों को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है।

इसी संदर्भ में कोल गैसीफिकेशन की अहमियत बढ़ जाती है। इस तकनीक के तहत कोयले को रासायनिक प्रक्रिया के माध्यम से सिंथेटिक गैस (Syngas) में परिवर्तित किया जाता है, जिससे अमोनिया, मेथनॉल, यूरिया और अन्य पेट्रोकेमिकल उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े कोयला भंडारों में से एक है, इसलिए यह तकनीक आयातित प्राकृतिक गैस पर निर्भरता कम करने में मदद कर सकती है।

सरकार ने राष्ट्रीय कोल गैसीफिकेशन मिशन के तहत वर्ष 2030 तक 100 मिलियन टन कोयले के गैसीफिकेशन का लक्ष्य रखा है। इसके लिए कई प्रोत्साहन योजनाएं भी शुरू की गई हैं। हाल ही में केंद्र सरकार ने राज्यों से भी कोल गैसीफिकेशन परियोजनाओं को बढ़ावा देने के लिए विशेष प्रोत्साहन नीति बनाने का आग्रह किया है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि कोल गैसीफिकेशन न केवल उर्वरक क्षेत्र को स्थिरता प्रदान करेगा बल्कि भारत के पेट्रोकेमिकल उद्योग के लिए भी नए अवसर पैदा करेगा। इससे मेथनॉल, अमोनिया और अन्य रसायनों के घरेलू उत्पादन में वृद्धि होगी, जिससे आयात पर निर्भरता घटेगी और विदेशी मुद्रा की बचत होगी।

हालांकि पर्यावरणीय चुनौतियों को देखते हुए इस तकनीक में कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) जैसी आधुनिक तकनीकों को शामिल करना भी आवश्यक होगा। यदि इसे स्वच्छ तकनीकों के साथ लागू किया जाता है, तो कोल गैसीफिकेशन भारत की ऊर्जा सुरक्षा, उर्वरक आत्मनिर्भरता और औद्योगिक विकास का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है। बढ़ती वैश्विक ऊर्जा कीमतों के बीच भारत के लिए यह केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा एक रणनीतिक कदम साबित हो सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *