Samudra Manthan Yojana aims to explore deep-sea minerals in the Indian Ocean, boosting India’s blue economy, energy security, and strategic mineral independence while ensuring sustainable development and environmental safeguards.
Samudra Manthan Yojana : भारत सरकार की महत्वाकांक्षी समुद्र मंथन योजना देश की ब्लू इकॉनमी को मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। इस योजना का उद्देश्य गहरे समुद्र में मौजूद खनिज संपदा की खोज, आकलन और सतत दोहन के जरिए ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा और green teach क्षेत्रों को आवश्यक कच्चा माल उपलब्ध कराना है। बढ़ती औद्योगिक मांग और ऊर्जा के क्षेत्र में हो रहे बदलाव के दौर में यह पहल रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
क्या है समुद्र मंथन योजना?
समुद्र मंथन योजना का मूल फोकस हिंद महासागर क्षेत्र में 5,000–6,000 मीटर गहराई तक मौजूद बहुमूल्य खनिजों की पहचान और उनके व्यावसायिक उपयोग की तैयारी है। समुद्र की तलहटी में पाए जाने वाले पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स (Polymetallic Nodules) में निकल, कोबाल्ट, कॉपर और मैंगनीज जैसे धातु तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। ये धातुएं इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरियों, सोलर पैनल, विंड टर्बाइन और हाई-एंड इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्माण में अहम भूमिका निभाती हैं।
भारत को अंतरराष्ट्रीय समुद्र प्राधिकरण (ISA) से मध्य हिंद महासागर बेसिन में लगभग 75,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में माइनिंग का अधिकार पहले से प्राप्त है। अब इस योजना के तहत अन्वेषण को तेज करने, स्वदेशी तकनीक विकसित करने और पायलट स्तर पर खनन की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं।
रणनीतिक महत्व
दुनिया भर में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) के चलते बैटरी मेटल्स की मांग तेजी से बढ़ रही है। वर्तमान में इन धातुओं की आपूर्ति कुछ चुनिंदा देशों तक सीमित है, जिससे सप्लाई-चेन जोखिम बढ़ता है। समुद्र मंथन योजना भारत को इन रणनीतिक खनिजों में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में सहायक हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गहरे समुद्र में खनन की तकनीक व्यावसायिक रूप से सफल हो जाती है, तो भारत वैश्विक बैटरी और नवीकरणीय ऊर्जा बाजार में एक मजबूत खिलाड़ी बन सकता है। इससे आयात पर निर्भरता कम होगी और विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
आर्थिक और औद्योगिक प्रभाव
सरकार का अनुमान है कि इस परियोजना से आने वाले वर्षों में अरबों डॉलर की आर्थिक गतिविधि उत्पन्न हो सकती है। इससे समुद्री इंजीनियरिंग, रोबोटिक्स, डेटा मैपिंग, जहाज निर्माण और खनन उपकरण निर्माण जैसे क्षेत्रों में नए अवसर पैदा होंगे। तटीय राज्यों में रोजगार के अवसर बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है।
इसके साथ ही, ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को भी गति मिलने की उम्मीद है। स्वदेशी तकनीक के विकास से भारत वैश्विक बाजार में तकनीकी निर्यातक के रूप में उभर सकता है।
पर्यावरणीय चुनौतियां
हालांकि, गहरे समुद्र में खनन को लेकर पर्यावरणविदों की चिंताएं भी सामने आ रही हैं। समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र (Marine Ecosystem) बेहद संवेदनशील होता है और तलहटी में खनन से जैव विविधता पर असर पड़ सकता है। वैज्ञानिक समुदाय का कहना है कि किसी भी व्यावसायिक खनन से पहले व्यापक पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) आवश्यक है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि समुद्र मंथन योजना को अंतरराष्ट्रीय मानकों और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के तहत लागू किया जाएगा। सतत विकास (Sustainable Development) को प्राथमिकता देते हुए तकनीक और निगरानी तंत्र विकसित किए जा रहे हैं।
आगे की राह
आने वाले चरण में पायलट खनन परियोजनाएं शुरू करने और स्वदेशी गहरे समुद्री वाहन (Deep Sea Mining Vehicle) को तैनात करने की योजना है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगले 5–7 वर्षों में इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति देखने को मिल सकती है।
समुद्र मंथन योजना केवल एक खनन परियोजना नहीं, बल्कि भारत की समुद्री शक्ति, तकनीकी क्षमता और आर्थिक महत्वाकांक्षा का प्रतीक बनकर उभर रही है। यदि पर्यावरणीय संतुलन और तकनीकी दक्षता के साथ इसे लागू किया गया, तो यह भारत को ब्लू इकॉनमी के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व दिलाने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल साबित हो सकती है।
