अमेरिका के साथ ट्रेड डील होने के बाद अब भारत कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के आयात स्रोतों में बड़ा बदलाव कर सकता है। अभी तक रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदने वाली भारतीय कंपनियां अब अमेरिका से कच्चा तेल खरीद सकती हैं, हालांकि अमेरिका से तेल खरीदना थोड़ा महंगा पड़ेगा, जानकार उम्मीद जता रहे हैं कि अमेरिकी कंपनियों के साथ तेल खरीदने पर कीमतों में बातचीत से हल निकल सकता है। हाल के वर्षों में भारत ने अमेरिका से कच्चे तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की खरीद बढ़ाई है, जबकि रूस से आयात में धीरे-धीरे संतुलन बनाने की रणनीति अपनाई जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उठाया जा रहा है।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद रूस ने रियायती दरों पर भारत को कच्चा तेल उपलब्ध कराया, जिससे भारत ने रूस से बड़े पैमाने पर तेल आयात बढ़ाया था। हालांकि अब अमेरिका के भारतीय उत्पादों पर टैरिफ घटाने और ट्रेड डील करने के बाद भारत ऊर्जा आयात को विविध बनाने पर जोर दे रहा है ताकि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचा जा सके।
अमेरिका भारत के लिए ऊर्जा क्षेत्र में तेजी से उभरता हुआ साझेदार बन रहा है। अमेरिका से कच्चे तेल और LNG की आपूर्ति बढ़ने से भारत को ऊर्जा स्रोतों में विविधता मिल रही है। साथ ही अमेरिका से मिलने वाला LNG भारत के गैस आधारित ऊर्जा ढांचे को मजबूत करने में मदद कर रहा है। भारत सरकार प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी को ऊर्जा मिश्रण में बढ़ाकर 2030 तक लगभग 15 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रख रही है।
ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका से ऊर्जा आयात बढ़ाने के पीछे रणनीतिक और आर्थिक दोनों कारण हैं। अमेरिका के साथ बढ़ता ऊर्जा सहयोग भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करता है और वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारत की सौदेबाजी क्षमता भी बढ़ाता है। इसके अलावा अमेरिका से आयातित LNG पर्यावरण के लिहाज से अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन माना जाता है, जो भारत के कार्बन उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य के अनुरूप है।
हालांकि भारत रूस से ऊर्जा आयात पूरी तरह समाप्त नहीं कर रहा है। रूस भारत के लिए अभी भी एक महत्वपूर्ण और किफायती ऊर्जा आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत संतुलित नीति अपनाते हुए अमेरिका, मध्य पूर्व, अफ्रीका और रूस सहित कई देशों से ऊर्जा आयात जारी रखेगा। यह रणनीति वैश्विक तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक जोखिमों से बचाव में मदद करेगी।
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि भारत की यह नीति ‘एनर्जी डाइवर्सिफिकेशन’ और ‘एनर्जी सिक्योरिटी’ की दिशा में अहम कदम है। इससे भारत को बेहतर मूल्य पर ऊर्जा प्राप्त करने, आपूर्ति जोखिम कम करने और वैश्विक ऊर्जा बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद मिलेगी।
विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में भारत अमेरिका के साथ ऊर्जा व्यापार, LNG टर्मिनल विकास और स्वच्छ ऊर्जा सहयोग को और मजबूत कर सकता है। इससे भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करने के साथ-साथ पर्यावरणीय लक्ष्यों को हासिल करने में भी सहायता मिलेगी।
