इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOC) ने हाइड्रोजन से चलने वाले ड्रोन की सफल जांच और उड़ान परीक्षण करके ग्रीन एविएशन की दिशा में एक अहम कदम बढ़ाया है। इस परीक्षण ने साबित किया कि स्वच्छ हाइड्रोजन ऊर्जा ड्रोन जैसी अनमैन्ड एरियल सिस्टम में भी व्यावहारिक और प्रभावी तरीके से इस्तेमाल की जा सकती है। इस ड्रोन को गोवा में चल रहे इंडिया एनर्जी भी में भी प्रदर्शित किया गया है।
क्या है हाइड्रोजन ड्रोन टेस्ट?
यह परीक्षण हाइड्रोजन फ्यूल सेल सिस्टम से लैस ड्रोन पर किया गया, जिसमें स्थानीय स्तर पर विकसित हाइड्रोजन कम्पोजिट सिलिंडर को इंटीग्रेट किया गया। ट्रायल के दौरान ड्रोन ने तय किए गए सभी प्रदर्शन मानकों जैसे एंड्योरेंस, पेलोड और ऑपरेशनल पैरामीटर्स को सफलतापूर्वक हासिल किया। इस टेस्ट का मकसद यह दिखाना था कि हाइड्रोजन आधारित ड्रोन पारंपरिक बैटरी ड्रोन की तुलना में ज्यादा समय तक उड़ान भर सकते हैं और ज्यादा भरोसेमंद ऑपरेशन दे सकते हैं।
इंडियन ऑयल की ग्रीन हाइड्रोजन रणनीति से जुड़ाव
IOC पहले से ही हरियाणा के पानीपत रिफाइनरी में देश का सबसे बड़ा ग्रीन हाइड्रोजन प्लांट विकसित कर रहा है, जिसकी सालाना क्षमता 10,000 टन होगी। यह प्लांट रिन्यूएबल एनर्जी से इलेक्ट्रोलिसिस के जरिए ग्रीन हाइड्रोजन तैयार करेगा, जिसे इंडियन ऑयल अपनी रिफाइनरी और अन्य औद्योगिक जरूरतों के लिए इस्तेमाल करेगी।
ड्रोन परीक्षण में हाइड्रोजन के उपयोग से कंपनी की व्यापक डीकार्बोनाइजेशन रणनीति और नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के लक्ष्य को तकनीकी स्तर पर प्रदर्शित किया गया है। परीक्षण के नतीजे और तकनीकी लाभशुरुआती उड़ान परीक्षणों में हाइड्रोजन ड्रोन ने लंबी अवधि तक लगातार उड़ान भरने की क्षमता दिखाई, जो समान आकार के बैटरी ड्रोन के मुकाबले कई गुना है।
हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक के इस्तेमाल से ड्रोन के ऑपरेशन के दौरान कार्बन उत्सर्जन व्यावहारिक रूप से शून्य रहता है, जिससे यह समाधान पूरी तरह ग्रीन एविएशन की श्रेणी में आता है। तेज रीफ्यूलिंग, हाई एनर्जी डेंसिटी और कम मेंटेनेंस जरूरतों के कारण यह तकनीक इंडियन ऑयल जैसी ऊर्जा कंपनियों के लिए पाइपलाइन निगरानी, रिफाइनरी सर्विलांस और सुरक्षा से जुड़े कार्यों में अत्यंत उपयोगी साबित हो सकती है। संभावित उपयोग और भविष्य की दिशासफल टेस्ट के बाद हाइड्रोजन आधारित ड्रोन का उपयोग पाइपलाइन निरीक्षण, रिफाइनरी और टर्मिनल की निगरानी, आपदा प्रबंधन, सुरक्षा गश्त और इंफ्रास्ट्रक्चर सर्वे जैसे क्षेत्रों में बढ़ाया जा सकता है। लंबे समय तक हवा में बने रहने की क्षमता के कारण यह ड्रोन दूर-दराज इलाकों में क्रिटिकल एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर की निगरानी के लिए खास तौर पर फायदेमंद रहेंगे। इंडियन ऑयल का यह कदम ग्रीन हाइड्रोजन इकोसिस्टम को मजबूत करने के साथ ही भारत को हाइड्रोजन फ्यूल सेल आधारित ड्रोन तकनीक में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बढ़त दिलाने की दिशा में भी देखा जा रहा है ।

